जब सोमनाथ मंदिर के पुननिर्माण के लिए नेहरू से भीड़ गए थे, सरदार वल्लभ भाई पटेल

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आज हम देश के लौहपुरुष कहे जाने वाले सरदार वल्लभ भाई पटेल जी के जीवन की उस घटना के बारे में बताने जा रहें हैं, जब उन्होंने देश के प्रधानमंत्री नेहरू की सोच से अलग हटकर सोमनाथ मंदिर के पुननिर्माण के काम को पूरा करने का मन बना लिया था. पहले हम सोमनाथ मंदिर के इतिहास के बारे में जानते है जिसे कांग्रेस द्वारा किताबों से दूर रखा गया.

सोमनाथ का मंदिर भारत के गुजरात में सौराष्ट्र क्षेत्र के वेरावल शहर में मजूद है. सोमनाथ का यह मंदिर समुन्द्र के पास ही है. वर्तमान समय में बना हुआ यह सोमनाथ का मंदिर आज़ाद भारत के पहले प्रधानमंत्री नेहरू के विरोध के बावजूद सरदार वलभ भाई पटेल द्वारा बनाया गया था.

इतिहास में इस मंदिर का निर्माण कई बार हुआ था लेकिन हर बार इसे मुस्लिम शासक आकर तोड़ देते थे. हिन्दू ग्रंथों के अनुसार सोमनाथ मंदिर का निर्माण स्वयं सोमराज यानी चंद्र देवता ने किया थी. हिन्दू कथाओं के अनुसार चन्द्रदेवता ने दक्षप्रजापति जी की 27 पुत्रियों से विवाह किया था लेकिन उन 27 पुत्रियों में से वह रोहिणी को ही सबसे अधिक प्रेम करते थे.

अपनी बाकी की 26 पुत्रियों के साथ अन्याय होता देख दक्षप्रजापति ने चंद्रदेव को श्राप दिया की अब तुम्हारा तेज़ धीरे-धीरे खत्म होता जाएगा. इस श्राप से मुक्ति पाने के लिए चंद्रदेव ने भगवान् शिव की तपस्या शुरू कर दी. भगवान् शिव जब प्रसन होकर चंद्रदेव के सामने आए तो उन्होंने इस श्राप से मुक्ति पाने का फल मांग लिया.

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माना जाता है की तब भगवान् शिव ने चंद्रदेव से कहा की आज से 15 सूर्यास्त के बाद तक तुम्हारा तेज़ कम होता जाएगा और अगले 15 सूर्यास्त के बाद तुम्हारा तेज़ बढ़ता जाएगा. इस श्राप से मुक्ति पाने के बाद से ही चंद्रदेव ने सोमनाथ मंदिर का निर्माण शुरू करवा दिया.

बताया जाता है की सोमनाथ के मंदिर को सोने से बनाया गया था और सोम का अर्थ था चन्द्रमा और नाथ का अर्थ था भगवान्. सोमनाथ मंदिर के बारे में यह भी धारणा है की भगवान् श्री कृष्ण ने यहीं पर अपने प्राण त्याग कर सवर्ग की और प्रस्थान किया था.

सोमनाथ मंदिर पहली बार कब बना था इसकी किसी भी तरह की कोई भी ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है. लेकिन इस बात के प्रमाण है की 649 ईसवी में वैलभी के मैत्रिक राजाओं ने इसका पूर्ण निर्माण करवाया था. परन्तु सिंध प्रांत के मुस्लिम सूबेदार अल-जुनैद ने इसे 725 ईसवी में तुड़वा दिया था.

प्रतिहार के राजा नागभट ने 825 ईसवी में इस मंदिर को दुबारा बनवाया था. इस मंदिर की धन दौलत की गाथाएं दूर दूर तक फैली हुई थी. जिसके प्रणाम स्वरूप 1025 ईसवी में महमूद ग़ज़नवी अपने 5000 सैनिकों के साथ आकर मंदिर को लूट ले गया. लेकिन इस लूट-पात के बीच मंदिर के आस पास रहते 25000 हिंदुवो का कत्लेआम भी किया गया.

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महमूद ग़ज़नवी के लूट लेने बाद राजा भीमदेव ने इसे दुबारा बनवाया था और उसके बाद 1093 में सिद्धराज जयसिंह ने मंदिर के पवित्रीकरण और प्रतिष्ठा में भरपूर सहयोग दिया था. इसके बाद विजेश्वर कुमारपाल और सौराष्ट्र के राजा खंगार ने 1168 ईसवी में इस मंदिर का सौंदर्यीकरण करवाया था.

जब दिल्ली की सल्तनत सुलतान अलाउद्दीन खिलजी के हाथ में लगी तो उसके सेनापति नुसरत खां ने गुजरात पर 1297 ईसवी में हमला कर दिया. इस हमले में उसने मंदिर को तो लूटा ही साथ में उसने शिव के प्रतीक यानी शिवलिंग को भी खंडित कर दिया.

ऐसे में हिन्दू राजाओं ने कई बार इस मंदिर का पुर्निर्माण करवाया और कई बार मुस्लिम राजाओं ने इस मंदिर को तुड़वाया. इसीबीच 1395 में गुजरात में मुजफ्फरशाह का राज आया और उसने इस मंदिर को जमकर लूटा, इसके बाद 1413 ईसवी में सत्ता बदली और अब सुलतान की कुर्सी पर उसका पुत्र अहमदशाह विराजमान हुआ लेकिन मंदिर की लूटपाट अभी भी बंद नहीं हुई.

मुसलमानो के महान शासक औरंगजेब के काल में भी सोमनाथ का मंदिर दो बार तोडा गया था. 1665 में मंदिर तुड़वाने के बाद जब औरंगजेब को सूचना मिली की हिन्दुवों ने वह दुबारा पूजा अर्चना करनी शुरू कर दी है तो 1706 ईसवी में फिर से मंदिर को तुड़वाया गया और आस पास के इलाकों में रहने वाले लोगो को जान से मार दिया गया.

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एक वक़्त ऐसा भी आया जब मराठाओं के हिस्से में अधिकाँश भारत का हिस्सा आ गया था उस वक़्त 1783 ईसवी में इंदौर की मराठा रानी ने अहिल्याबाई द्वारा मूल मंदिर से कुछ ही दूरी पर एक नया सोमनाथ का मंदिर त्यार करवाया गया था जिसके बाद वह हिन्दू लोगो ने दुबारा पूजा अर्चना शुरू कर दी.

मूल मंदिर को वैसे का वैसे ही रहने दिया. इसके आबाद 9 नवंबर 1947 में जूनागढ़ को सरदार वल्लभ भाई पटेल ने भारत में शामिल करवा लिया था. इसके बाद सोमनाथ मंदिर का दौरा करते हुए नजदीक समुद्र के पानी को हाथ में लेकर उन्होंने मंदिर के पुर्निर्माण का संकल्प लिया था.

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नेहरू के विरोध के बावजूद 1950 में इस मंदिर का बनना शुरू हुआ जिसके बाद 1951 में भारत के पहले राष्ट्रपति श्री राजेंद्र प्रसाद जी ने ज्योतिर्लिंग की स्थापना की थी और 1952 में मंदिर बनकर पूरी तरह से त्यार हो गया था.