Tuesday, September 27, 2022

बीकेयू ने राकेश टिकैत को लेकर उठाए ये कदम.. जानिए पूरा मामला !

उत्तर प्रदेश: 2020 का किसान आन्दोलन तो आपको याद ही होगा, राकेश टिकैत की अगुवाई में एक साल से भी लम्बे चले इस अभियान को हरेक जगह पर प्रमुखता से दिखाया गया। हर अख़बार और न्यूज़ चैनलों में यह हेडलाइन बना रहा।

राकेश टिकैत को बीकेयू से किया बाहर

अब एक चौंकाने वाली ख़बर आयी है कि भारतीय किसान युनियन यानी BKU के प्रवक्ता राकेश टिकैत को ही बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है। इन्हें BKU से निस्कासित कर दिया गया है। इस संगठन के फ़ायर ब्राण्ड नेता माने जाने वाले राकेश टिकैत का इस क़दर भारतीय किसान युनियन से बाहर हो जाना बड़ी ख़बर है। ख़बर ये भी है कि नरेश टिकैत को भी राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से हाथ धोना पड़ गया है। राकेश टिकैत BKU के पर्याय से बन गए थे।

राजनीति करने का लगा आरोप

सूत्रों की मानें तो BKU ने टिकैत पर किसानों के साथ राजनीति करने का आरोप लगाया है। अब राजनीति तो होती ही क्योंकि राकेश साहब पहले चुनाव भी लड़ चुके हैं। किसानों की तरफ़ से सरकार से लड़ाई करते करते उन्होंने कई राजनीतिक दाँव-पेंच भी आज़माए थे। उनकी हरेक चाल राजनीति से प्रेरित प्रतीत होती थी। ऐसे में उन्होंने संगठन से जुड़े अपने किसान भाइयों के साथ ही राजनीति खेली तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं है।

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने तीनों कृषि बिलों दी थी हरी झंडी

27 सितंबर, 2020 यह वह दिन था, जब राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने तीनों कृषि बिलों को हरी झंडी दे दी। इसके बाद इसने कानून की शक्ल ले ली और कानूनों के खिला फ विरोध और बढ़ता गया। 25 नवंबर, 2020 को किसान संगठनों ने दिल्ली चलो आंदोलन का आह्वान किया। 26 नवंबर को दिल्ली की ओर जा रहे किसानों का पुलिस के साथ आमना-सामना हुआ। किसानों का शोषण, कृषि उपज का उचित दाम न मिलना, किसानों पर बढ़ता कर्ज, किसानों पर बढ़ते हुए शुल्क, बिजली के बढ़ते बिल आदि उनके प्रमुख मुद्दे थे। इस लिहाज से देखा जाए तो किसान आंदोलन की एक महत्वपूर्ण सकारात्मक भूमिका बनती है। एक साल तक चले इस आंदोलन ने उत्तर भारत के एक बड़े हिस्से के किसानों को उनके नेताओं से जोड़ा है। अब यह नेतृत्व सरकार के साथ सतत संवाद बनाए रखते हुए सरकार और किसानों के बीच पुल का काम कर सकता है।

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